वितण्डा, छल, निग्रहादि अनेक उठाइल ।
सब खण्डि’ प्रभु निज - मत से स्थापिल ॥177॥
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अनुवाद
भट्टाचार्य ने छद्म तर्कों के साथ नाना प्रकार के मिथ्या तर्क प्रस्तुत किए और अपने प्रतिद्वन्द्वी को अनेक प्रकार से परास्त करने का प्रयास किया। परन्तु श्री चैतन्य महाप्रभु ने इन सभी तर्कों का खंडन किया और अपना मत स्थापित किया।
Bhattacharya presented various false arguments, including pseudo-logic, and tried in many ways to defeat his opponent. However, Sri Chaitanya Mahaprabhu refuted all these arguments and established his own view.
तात्पर्य
विटंडा शब्द यह दर्शाता है कि वाद करने वाला मुख्य बिंदु पर न ज़ाकर या अपना मत स्थापित न कर, दूसरे के पक्ष का खंडन मात्र करता है। जब कोई सीधे अर्थ को न उठाकर, शब्दों के अर्थ को बिगाड़कर बात को कहीं और लगा ले जाये, तब वह छल करता है। निग्रह शब्द का अर्थ भी दूसरे पक्ष के मत का खंडन मात्र करने से है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥