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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 6: सार्वभौम भट्टाचार्य की मुक्ति  »  श्लोक 174
 
 
श्लोक  2.6.174 
‘प्रणव’ ये महा - वाक्य - ईश्वरेर मूर्ति ।
प्रणव हैते सर्व - वेद, जगत् उत्पत्ति ॥174॥
 
 
अनुवाद
"दिव्य स्पंदन ओंकार भगवान का नाद रूप है। समस्त वैदिक ज्ञान और यह ब्रह्मांडीय अभिव्यक्ति परम भगवान के इसी नाद स्वरूप से उत्पन्न हुई है।"
 
"The transcendental sound of Omkara is the word form of the Supreme Personality of Godhead. All Vedic knowledge and this vast universe have arisen from this word form of the Lord."
तात्पर्य
ओम्कार ध्वनि में परमेश्वर के व्यक्तित्व का प्रतिनिधित्व है। उनके पवित्र नाम का यह रूप अलौकिक कंपन (महा-वाक्य) के रूप में स्वीकार किया जाता है जिसके गुण से अस्थायी भौतिक अभिव्यक्ति अस्तित्व में आई है। यदि कोई परमेश्वर के व्यक्तित्व (ओंकार) के ध्वनि प्रतिनिधित्व की शरण लेता है, तो वह अपनी संवैधानिक पहचान का एहसास कर सकता है और सशर्त जीवन में भी भक्ति सेवा में संलग्न हो सकता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)