श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 6: सार्वभौम भट्टाचार्य की मुक्ति  »  श्लोक 172
 
 
श्लोक  2.6.172 
व्यास - भ्रान्त ब लि’ सेइ सूत्रे दोष दिया ।
‘विवर्त - वाद’ स्थापियाछे कल्पना करिया ॥172॥
 
 
अनुवाद
"शंकराचार्य कहते हैं कि वेदान्त-सूत्र में प्रस्तुत परिवर्तन के सिद्धांत का तात्पर्य है कि परम सत्य स्वयं रूपांतरित होता है। इस प्रकार मायावादी दार्शनिक श्रील व्यासदेव पर त्रुटि का आरोप लगाकर उनका अपमान करते हैं। इस प्रकार वे वेदान्त-सूत्र में दोष ढूंढ़ते हैं और भ्रम के सिद्धांत को स्थापित करने के लिए उसकी गलत व्याख्या करते हैं।"
 
"According to Shankaracharya's theory, the Absolute Truth is transformed. On the basis of this theory, the Māyāvādī philosophers disparage Srila Vedavyasa by pointing out his flaws. In this way, they find flaws in the Vedānta-sūtras and apply their own interpretation to establish the theory of evolution."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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