जब नास्तिक दार्शनिक या मायावादी, परम भगवान की अकल्पनीय ऊर्जाओं को समझने में असमर्थ होते हुए, एक अवैयक्तिक शून्य की कल्पना करते हैं, तो उनकी कल्पना केवल भौतिकवादी सोच की प्रतिरूप होती है। भौतिक संसार में, कुछ भी अकल्पनीय नहीं है। उच्च विचार वाले दार्शनिक और वैज्ञानिक भौतिक ऊर्जा से निपट सकते हैं, लेकिन आध्यात्मिक ऊर्जा को समझने में सक्षम नहीं होने के कारण, वे बस एक निष्क्रिय अवस्था की कल्पना कर सकते हैं, जैसे कि अवैयक्तिक ब्रह्म। यह केवल भौतिक जीवन का नकारात्मक पक्ष है। इस तरह के अपूर्ण ज्ञान से मायावादी दार्शनिक यह निष्कर्ष निकालते हैं कि ब्रह्मांडीय अभिव्यक्ति परम की रूपांतरण है। इस प्रकार उन्हें सर्वोच्च (विवर्ता-वाद) के भ्रम के सिद्धांत को भी स्वीकार करना होगा। हालाँकि, यदि हम भगवान की अकल्पनीय शक्तियों को स्वीकार करते हैं, तो हम समझ सकते हैं कि परम भगवान भौतिक प्रकृति के तीनों प्रकारों से अछूते या दूषित हुए बिना इस भौतिक दुनिया में कैसे प्रकट हो सकते हैं।
शास्त्रों से हम जानते हैं कि एक पत्थर या रत्न है जिसे पारस पत्थर कहा जाता है जो लोहे को सोने में बदल सकता है। यद्यपि पारस पत्थर लोहे को कई बार सोने में बदल देता है, फिर भी वह अपनी मूल स्थिति में बना रहता है। यदि ऐसा भौतिक पत्थर सोने के आयतन का उत्पादन करने के बाद अपनी अकल्पनीय ऊर्जा बनाए रख सकता है, तो निश्चित रूप से परम भगवान ब्रह्मांडीय संसार बनाने के बाद अपने मूल सच्चिदानंद रूप में रह सकते हैं। जैसा कि भगवद गीता (9.10) में पुष्टि की गई है, वह केवल अपनी विभिन्न ऊर्जाओं के माध्यम से कार्य करता है। मायाध्यक्षेण प्रकृति: कृष्ण भौतिक ऊर्जा को निर्देशित करते हैं, और वह शक्ति इस भौतिक दुनिया में कार्य करती है। इसकी पुष्टि ब्रह्म-संहिता (5.44) में भी की गई है:
सृष्टि-स्थिति-प्रलय-साधन-शक्तिर एका
छायेव यस्य भुवनानि बिभर्ति दुर्गा
इच्छानुरूपम अपि यस्य च चेष्टते सा
गोविंदं आदि-पुरुषं तम अहं भजामी
दुर्गा-शक्ति (भौतिक ऊर्जा) परम भगवान के निर्देशन में कार्य करती है, और ब्रह्मांडीय सृजन, अनुरक्षण और विनाश दुर्गा-शक्ति द्वारा किया जा रहा है। कृष्ण का निर्देश पृष्ठभूमि में है। निष्कर्ष यह है कि परम भगवान वैसे ही बने रहते हैं, जैसा वह हैं, भले ही अपनी ऊर्जा को निर्देशित कर रहे हों, जो विविध ब्रह्मांडीय अभिव्यक्ति को इतने अद्भुत तरीके से काम करता है।
