येऽन्येऽरविन्दलोचन विमुक्त-मानिनो
त्वय्यस्त-भावदविशुद्ध-बुद्धयः
आरुह्य कृच्छ्रेण परं पदं ततः
पतन्त्यधोऽनादृत-युष्मदङ्घ्रयः
मायावादियों की बुद्धि शुद्ध नहीं है; इसलिए भले ही वे आत्म-साक्षात्कार के लिए तपस्या करते हैं, वे अवैयक्तिक ब्रह्मज्योति के भीतर नहीं रह सकते। फलस्वरूप, वे फिर से इस भौतिक दुनिया में गिर जाते हैं।
मायावादियों की आध्यात्मिक अस्तित्व की अवधारणा भौतिक अस्तित्व के निषेध के लगभग समान है। मायावादी मानते हैं कि आध्यात्मिक जीवन में कुछ भी सकारात्मक नहीं है। परिणामस्वरूप, वे भक्ति सेवा या परम पुरुष, सद्-चित-आनंद-विग्रह की पूजा को समझ नहीं पाते हैं। मायावादी दार्शनिक भक्ति सेवा में देवता पूजा को प्रतिबिम्ब-वाद या एक ऐसे रूप की पूजा मानते हैं जो एक झूठे भौतिक रूप का प्रतिबिंब है। इस प्रकार भगवान का पारलौकिक रूप, जो सदा आनंदमय और ज्ञान से परिपूर्ण है, मायावादी दार्शनिकों के लिए अज्ञात है। यद्यपि शब्द "भगवान" को स्पष्ट रूप से श्रीमद्-भागवतम में वर्णित किया गया है, वे इसे समझ नहीं सकते हैं। ब्रह्मति परमात्मति भगवान इति शब्दते: “परम सत्य को ब्रह्म, परमात्मा और भगवान कहा जाता है।” (भाग. १.२.११) मायावादी केवल ब्रह्म को, या अधिकतम, परमात्मा को समझने की कोशिश करते हैं। हालाँकि, वे भगवान को समझने में असमर्थ हैं। इसलिए भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं, मायापहृत-ज्ञान। मायावादी दार्शनिकों के स्वभाव के कारण, उनसे वास्तविक ज्ञान छीन लिया जाता है। क्योंकि वे भगवान की कृपा प्राप्त नहीं कर सकते, वे सदैव उनके पारलौकिक रूप से विचलित रहेंगे। अवैयक्तिक दर्शन ज्ञान के तीन चरणों - ज्ञान, ज्ञेय और ज्ञाता को नष्ट कर देता है। जैसे ही कोई ज्ञान की बात करता है, एक व्यक्ति होना चाहिए जो ज्ञाता है, ज्ञान स्वयं और ज्ञान का उद्देश्य। मायावाद दर्शन इन तीनों श्रेणियों को मिलाता है; इसलिए मायावादी यह समझ नहीं पाते कि भगवान के आध्यात्मिक शक्तियाँ कैसे कार्य करती हैं। अपने ज्ञान के खराब फंड के कारण, वे आध्यात्मिक दुनिया में ज्ञान, ज्ञाता और ज्ञान के उद्देश्य के बीच अंतर को नहीं समझ सकते हैं। इसके कारण, श्री चैतन्य महाप्रभु मायावादी दार्शनिकों को बौद्धों से अधिक खतरनाक मानते हैं।
