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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 6: सार्वभौम भट्टाचार्य की मुक्ति  »  श्लोक 168
 
 
श्लोक  2.6.168 
वेद ना मानिया बौद्ध हय त’ नास्तिक ।
वेदाश्रय नास्तिक्य - वाद बौद्धके अधिक ॥168॥
 
 
अनुवाद
"बौद्ध वेदों की प्रामाणिकता को मान्यता नहीं देते; इसलिए उन्हें अज्ञेयवादी माना जाता है। हालाँकि, जो लोग वैदिक शास्त्रों का आश्रय लेकर मायावादी दर्शन के अनुसार अज्ञेयवाद का प्रचार करते हैं, वे निश्चित रूप से बौद्धों से भी अधिक खतरनाक हैं।"
 
"Because Buddhists do not accept the authority of the Vedas, they are considered atheists. But those who, despite taking refuge in the Vedic scriptures, preach atheism based on Mayavadi philosophy are even more atheistic than Buddhists."
तात्पर्य
हालाँकि बौद्ध सीधे वैष्णव दर्शन के विरोधी हैं, यह आसानी से समझा जा सकता है कि शंकरी अधिक खतरनाक हैं क्योंकि वे वेदों के अधिकार को स्वीकार करते हैं फिर भी वैदिक निर्देश के विपरीत कार्य करते हैं। वेदाश्रय नास्तिक्यवाद का अर्थ है "वैदिक संस्कृति की आड़ में अज्ञेयवाद" और मायावादियों के अद्वैत दर्शन को संदर्भित करता है। भगवान बुद्ध ने वैदिक साहित्य के अधिकार को त्याग दिया और इसलिए वेदों में अनुशंसित अनुष्ठानिक समारोहों और बलिदानों को अस्वीकार कर दिया। उनके निर्वाण दर्शन का अर्थ है सभी भौतिक गतिविधियों को रोकना। भगवान बुद्ध ने भौतिक जगत से परे पारलौकिक रूपों और आध्यात्मिक गतिविधियों की उपस्थिति को नहीं पहचाना। उन्होंने इस भौतिक अस्तित्व से परे केवल शून्यवाद का वर्णन किया। मायावादी दार्शनिक वैदिक अधिकार के लिए होंठ सेवा देते हैं लेकिन वैदिक अनुष्ठानिक समारोहों से बचने की कोशिश करते हैं। वे एक पारलौकिक स्थिति के बारे में कुछ विचार प्रस्तुत करते हैं और खुद को नारायण या भगवान कहते हैं। हालाँकि, ईश्वर की स्थिति उनके संयोजन से बिलकुल अलग है। ऐसे मायावादी दार्शनिक खुद को कर्म-कांड (फलदायी गतिविधियों और उनकी प्रतिक्रियाओं) के प्रभाव से ऊपर मानते हैं। उनके लिए, आध्यात्मिक दुनिया को बौद्ध शून्यवाद के समान किया जाता है। अवैयक्तिकवाद और शून्यवाद में बहुत कम अंतर है। शून्यवाद को सीधे समझा जा सकता है, लेकिन मायावादी दार्शनिकों द्वारा प्रतिपादित अवैयक्तिकता को बहुत आसानी से समझा नहीं जा सकता है। बेशक, मायावादी दार्शनिक एक आध्यात्मिक अस्तित्व को स्वीकार करते हैं, लेकिन वे आध्यात्मिक दुनिया और आध्यात्मिक प्राणियों के बारे में नहीं जानते हैं। श्रीमद्-भागवतम (10.2.32) के अनुसार:

येऽन्येऽरविन्दलोचन विमुक्त-मानिनो

 त्वय्यस्त-भावदविशुद्ध-बुद्धयः

आरुह्य कृच्छ्रेण परं पदं ततः

 पतन्त्यधोऽनादृत-युष्मदङ्घ्रयः

मायावादियों की बुद्धि शुद्ध नहीं है; इसलिए भले ही वे आत्म-साक्षात्कार के लिए तपस्या करते हैं, वे अवैयक्तिक ब्रह्मज्योति के भीतर नहीं रह सकते। फलस्वरूप, वे फिर से इस भौतिक दुनिया में गिर जाते हैं।

मायावादियों की आध्यात्मिक अस्तित्व की अवधारणा भौतिक अस्तित्व के निषेध के लगभग समान है। मायावादी मानते हैं कि आध्यात्मिक जीवन में कुछ भी सकारात्मक नहीं है। परिणामस्वरूप, वे भक्ति सेवा या परम पुरुष, सद्-चित-आनंद-विग्रह की पूजा को समझ नहीं पाते हैं। मायावादी दार्शनिक भक्ति सेवा में देवता पूजा को प्रतिबिम्ब-वाद या एक ऐसे रूप की पूजा मानते हैं जो एक झूठे भौतिक रूप का प्रतिबिंब है। इस प्रकार भगवान का पारलौकिक रूप, जो सदा आनंदमय और ज्ञान से परिपूर्ण है, मायावादी दार्शनिकों के लिए अज्ञात है। यद्यपि शब्द "भगवान" को स्पष्ट रूप से श्रीमद्-भागवतम में वर्णित किया गया है, वे इसे समझ नहीं सकते हैं। ब्रह्मति परमात्मति भगवान इति शब्दते: “परम सत्य को ब्रह्म, परमात्मा और भगवान कहा जाता है।” (भाग. १.२.११) मायावादी केवल ब्रह्म को, या अधिकतम, परमात्मा को समझने की कोशिश करते हैं। हालाँकि, वे भगवान को समझने में असमर्थ हैं। इसलिए भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं, मायापहृत-ज्ञान। मायावादी दार्शनिकों के स्वभाव के कारण, उनसे वास्तविक ज्ञान छीन लिया जाता है। क्योंकि वे भगवान की कृपा प्राप्त नहीं कर सकते, वे सदैव उनके पारलौकिक रूप से विचलित रहेंगे। अवैयक्तिक दर्शन ज्ञान के तीन चरणों - ज्ञान, ज्ञेय और ज्ञाता को नष्ट कर देता है। जैसे ही कोई ज्ञान की बात करता है, एक व्यक्ति होना चाहिए जो ज्ञाता है, ज्ञान स्वयं और ज्ञान का उद्देश्य। मायावाद दर्शन इन तीनों श्रेणियों को मिलाता है; इसलिए मायावादी यह समझ नहीं पाते कि भगवान के आध्यात्मिक शक्तियाँ कैसे कार्य करती हैं। अपने ज्ञान के खराब फंड के कारण, वे आध्यात्मिक दुनिया में ज्ञान, ज्ञाता और ज्ञान के उद्देश्य के बीच अंतर को नहीं समझ सकते हैं। इसके कारण, श्री चैतन्य महाप्रभु मायावादी दार्शनिकों को बौद्धों से अधिक खतरनाक मानते हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)