श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 6: सार्वभौम भट्टाचार्य की मुक्ति  »  श्लोक 163
 
 
श्लोक  2.6.163 
गीता - शास्त्रे जीव - रूप ‘शक्ति’ करि’ माने ।
हेन जीवे ‘भेद’ कर ईश्वरेर सने ॥163॥
 
 
अनुवाद
"भगवद्गीता में जीव को भगवान की सीमांत शक्ति के रूप में स्थापित किया गया है। फिर भी आप कहते हैं कि जीव भगवान से पूर्णतः भिन्न है।
 
"In the Bhagavad Gita, the living entity is described as the neutral energy of the Supreme Personality of Godhead. Yet you say that the living entity is completely different from the Lord."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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