तया तिरोहितत्वाच्च शक्तिः क्षेत्र - ज्ञ - संज्ञिता ।
सर्व - भूतेषु भू - पाल तारतम्येन वर्तते ॥156॥
Warning: Undefined array key 1 in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 93
Deprecated: nl2br(): Passing null to parameter #1 ($string) of type string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 97
अनुवाद
"यह जीवात्मा, अविद्या के प्रभाव से आवृत होकर, भौतिक अवस्था में विभिन्न रूपों में विद्यमान है। हे राजन, इस प्रकार वह भौतिक शक्ति के प्रभाव से, अधिक या कम मात्रा में, आनुपातिक रूप से मुक्त है।"
"Covered by the influence of ignorance, this living entity exists in various forms in the material state. O King, in this way he remains liberated to a greater or lesser extent in proportion to the influence of the material energy."
तात्पर्य
मटेरियल ऊर्जा जीवित तत्व पर अलग-अलग डिग्री पर, प्रकृति के तीन मोडल से किस प्रकार संपर्क बनाता है, उसके आधार पर कार्य करती है। जीवन की 8,400,000 प्रजातियाँ हैं, कुछ निम्न, कुछ श्रेष्ठ और कुछ मध्यम। शरीर की श्रेष्ठता मटेरियल ऊर्जा के आवरण के अनुसार आंकी जाती है। निम्नतम श्रेणियों में -जलीय प्राणियों, पेड़-पौधों, कीड़ों, पक्षियों इत्यादि- आध्यात्मिक चेतना लगभग न के ही बराबर होती है। मध्यम श्रेणी -मानवीय जीवन रूप- आध्यात्मिक चेतना तुलनात्मक रूप से जागृत होती है। श्रेष्ठ जीवन रूपों में आध्यात्मिक चेतना पूर्णतया जागृत होती है। तब जीवित तत्व अपनी वास्तविक स्थिति को समझता है और कृष्ण भावना को विकसित करके मटेरियल ऊर्जा के प्रभाव से बचने की कोशिश करता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥