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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 6: सार्वभौम भट्टाचार्य की मुक्ति  »  श्लोक 152
 
 
श्लोक  2.6.152 
षड् - ऐश्वर्य - पूर्णानन्द - विग्रह याँहार ।
हेन - भगवाने तुमि कह निराकार ? ॥152॥
 
 
अनुवाद
“क्या आप उस भगवान को निराकार कह रहे हैं जिसका दिव्य स्वरूप छह दिव्य ऐश्वर्यों से पूर्ण है?
 
“Are you calling the Supreme Personality of Godhead, whose divine form is endowed with the six divine opulences, formless?”
तात्पर्य
अगर भगवान सर्वशक्तिमान निराकार हैं तो कैसे कहा जा सकता है कि वे बहुत तेज चलते हैं और उन्हें अर्पित की गई हर चीज को स्वीकार करते हैं? वैदिक मंत्रों के वास्तविक अर्थ को नकारते हुए, मायावादी दार्शनिक उनकी व्याख्या कर उन्हें और निरपेक्ष सत्य को निराकार सिद्ध करने का प्रयास करते हैं। वास्तव में, सर्वशक्तिमान भगवान का एक शाश्वत व्यक्तिगत स्वरूप है जो सभी ऐश्वर्यों से भरा हुआ है। मायावादी दार्शनिक निरपेक्ष सत्य को शक्तिहीन बताकर उसकी व्याख्या करने का प्रयास करते हैं। परन्तु, श्वेताश्वतरा उपनिषद (6.8) में साफ़ कहा गया है, परस्य शक्तिर विविधैव श्रूयते: "निरपेक्ष सत्य में बहुशक्तियाँ हैं"।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)