श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 6: सार्वभौम भट्टाचार्य की मुक्ति  »  श्लोक 141
 
 
श्लोक  2.6.141 
‘निर्विशेष’ ताँरे कहे येइ श्रुति - गण ।
‘प्राकृत’ निषेधि करे ‘अप्राकृत’ स्थापन ॥141॥
 
 
अनुवाद
"वेदों में जहाँ कहीं भी निराकार वर्णन है, वेदों का उद्देश्य यह स्थापित करना है कि भगवान से संबंधित प्रत्येक वस्तु दिव्य है और सांसारिक लक्षणों से मुक्त है।"
 
“Wherever the formless is mentioned in the Vedas, the purpose of the Vedas is to establish that everything related to the Supreme Personality of Godhead is transcendental and completely independent of material qualities.”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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