श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 6: सार्वभौम भट्टाचार्य की मुक्ति  »  श्लोक 137
 
 
श्लोक  2.6.137 
स्वतः - प्रमाण वेद सत्य येइ कय ।
‘लक्षणा’ करिले स्वतः - प्रामाण्य - हानि हय ॥137॥
 
 
अनुवाद
"वेदों के कथन स्वयंसिद्ध हैं। जो कुछ भी कहा गया है उसे स्वीकार करना ही होगा। यदि हम अपनी कल्पना के अनुसार व्याख्या करते हैं, तो वेदों का प्रमाण तुरंत नष्ट हो जाता है।"
 
"Vedic statements are self-evident. Every statement in the Vedas must be accepted. If we interpret them with our own imagination, the authority of the Vedic evidence is immediately destroyed."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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