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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 6: सार्वभौम भट्टाचार्य की मुक्ति  »  श्लोक 135
 
 
श्लोक  2.6.135 
प्रमाणेर मध्ये श्रुति प्रमाण - प्रधान ।
श्रुति ये मुख्यार्थ कहे, सेइ से प्रमाण ॥135॥
 
 
अनुवाद
"हालाँकि अन्य प्रमाण भी हैं, फिर भी वैदिक संस्करण में दिए गए प्रमाण को ही सर्वोपरि माना जाना चाहिए। प्रत्यक्ष रूप से समझे गए वैदिक संस्करण ही प्रथम श्रेणी के प्रमाण हैं।"
 
"Although there are other evidences, the Vedic evidence should be considered supreme. The principal meaning of the principles described in the Vedas is the best evidence."
तात्पर्य
कार्य जो परामर्श के लिए लिए जाने चाहिए वे श्रील जीवा गोस्वामी के तत्व-संधर्भ (१०-११), उस पर श्रील बलदेव विद्याभूषण की टिप्पणी, और ब्रह्म-सूत्र के निम्नलिखित छंद हैं: शास्त्र-योनित्वा (व 1.1.3), तर्काप्रतिष्ठानात (v 2.1.11) और श्रुतस्तु शब्द-मूलात्वात (v 2.1.27), जैसा कि श्री रामानुजाचार्य, श्री माधवाचार्य, श्री निम्बार्काचार्य और श्रील बलदेव विद्याभूषण ने टिप्पणी की है। अपनी पुस्तक सर्व-सम्‍वादिनि में, श्रील जीवा गोस्‍वामी ने नोट किया है कि यद्यपि दस प्रकार के साक्ष्‍य हैं - प्रत्यक्ष धारणा, वैदिक संस्‍करण, ऐतिहासिक संदर्भ, परिकल्‍पना और इसी तरह - और हालांकि वे सभी को आम तौर पर साक्ष्‍य के रूप में स्‍वीकार किया जाता है, एक परिकल्‍पना प्रस्‍तुत करने वाला व्‍यक्ति, वैदिक संस्‍करण पढ़ना, अपने अनुभव से अनुभव करना या उसकी व्‍याख्‍या करना चार तरीकों से अपूर्ण होना निश्चित है। अर्थात्, वह गलतियाँ करने, भ्रमित होने, धोखा देने और अपूर्ण इंद्रियाँ रखने के अधीन है। यद्यपि प्रमाण सही हो सकता है, व्यक्ति स्वयं अपने भौतिक दोषों के कारण गुमराह होने का खतरा है। प्रत्यक्ष प्रस्तुति के अलावा, एक मौका है कि एक व्याख्या सही नहीं हो सकती है। इसलिए निष्कर्ष यह है कि केवल एक प्रत्यक्ष प्रस्तुति को साक्ष्य माना जा सकता है। एक व्याख्या को साक्ष्य के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता है, लेकिन इसे साक्ष्य के प्रमाण के रूप में माना जा सकता है।

भगवद-गीता में, बहुत शुरुआत में कहा गया है:

धृतराष्ट्र उवाच

धर्म-क्षेत्रे कुरु-क्षेत्रे समवेता युयुत्सवः

मामकाः पाण्डवाश्चैव किम अकुर्वत संजय

भगवद-गीता के बयान स्वयं इस बात का सबूत हैं कि कुरुक्षेत्र नामक धार्मिक तीर्थ स्थल है जहाँ पाण्डव और कुरु युद्ध के लिए मिले थे। वहाँ मिलने के बाद, उन्होंने क्या किया? यह संजय से धृतराष्ट्र की जिज्ञासा थी। यद्यपि ये कथन बहुत स्पष्ट हैं, नास्तिक धर्म-क्षेत्र और कुरु-क्षेत्र शब्दों के विभिन्न अर्थों की व्याख्या करने की कोशिश करते हैं। इसलिए श्रील जीवा गोस्‍वामी ने हमें चेतावनी दी है कि किसी भी तरह की व्‍याख्‍या पर निर्भर न रहें। बिना व्‍याख्‍या के छंदों को लेना बेहतर है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)