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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 6: सार्वभौम भट्टाचार्य की मुक्ति  »  श्लोक 132
 
 
श्लोक  2.6.132 
सूत्रेर मुख्य अर्थ ना करह व्याख्यान ।
कल्पनार्थे तुमि ताहा कर आच्छादन ॥132॥
 
 
अनुवाद
"आप ब्रह्मसूत्रों का सीधा अर्थ नहीं समझाते। दरअसल, ऐसा लगता है कि आपका काम उनका असली अर्थ बताना है।"
 
"You are not explaining the main meaning of the Brahma Sutras. It seems your intention is to conceal the real meaning."
तात्पर्य
यह प्रत्येक मायावादी अथवा नास्तिकों के लिए विशिष्ट है जो वेदिक साहित्य का अर्थ अपनी स्वयं की कल्पनाशील तरीके से व्याख्या करते हैं। ऐसे मूर्ख व्यक्ति का असली उद्देश्य वैदिक साहित्य पर अव्यक्तिगत निष्कर्ष थोपना है। मायावादी नास्तिक भी भगवद गीता की व्याख्या करते हैं। श्रीमद्भगवद् गीता के प्रत्येक श्लोक में यह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि कृष्ण भगवान सर्वोच्च व्यक्तित्व है। प्रत्येक श्लोक में व्यासदेव कहते हैं, श्रीभगवान उवाच, "भगवान ने कहा," या "धन्य भगवान ने कहा।" यह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि धन्य भगवान ही सर्वोच्च व्यक्ति हैं, परंतु मायावादी नास्तिक अभी भी यह साबित करने का प्रयास करते हैं कि परम सत्य अवैयक्तिक है। अपने झूठे, काल्पनिक अर्थ प्रस्तुत करने के लिए, उन्हें इतनी अधिक शब्दबाजी और व्याकरण की व्याख्या को अपनाना होगा कि वे अंततः हास्यास्पद बन जाते हैं। इसलिए श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा कि किसी को भी मायावादी टीका-टिप्पणियों या किसी भी वैदिक साहित्य के उद्देश्यों को नहीं सुनना चाहिए।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)