श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 6: सार्वभौम भट्टाचार्य की मुक्ति  »  श्लोक 130
 
 
श्लोक  2.6.130 
प्रभु कहे, - “सूत्रेर अर्थ बुझिये निर्मल ।
तोमार व्याख्या शुनि’ मन हय त’ विकल” ॥130॥
 
 
अनुवाद
तब श्री चैतन्य महाप्रभु ने अपना मन प्रकट करते हुए कहा, "मैं प्रत्येक सूत्र का अर्थ बहुत स्पष्ट रूप से समझ सकता हूँ, लेकिन आपकी व्याख्याओं ने मेरे मन को केवल विचलित कर दिया है।
 
Then Mahaprabhu expressed his thoughts saying, “I can understand the meaning of each sutra very well, but your explanation has disturbed my mind.”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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