श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 6: सार्वभौम भट्टाचार्य की मुक्ति  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  2.6.13 
‘अधिरूढ़ भा व’ याँर, ताँर ए विकार ।
मनुष्येर देहे देखि, - बड़ चमत्कार ॥13॥
 
 
अनुवाद
सार्वभौम भट्टाचार्य ने विचार किया, "अधिरूढ़ भाव के असाधारण आनंदमय लक्षण श्री चैतन्य महाप्रभु के शरीर में प्रकट हो रहे हैं। यह बहुत अद्भुत है! ये लक्षण मनुष्य के शरीर में कैसे संभव हैं?"
 
Sarvabhauma Bhattacharya thought, "Extraordinary divine signs of the Adhirudha Bhava are manifesting in the body of Sri Chaitanya Mahaprabhu. This is astonishing! How is this possible in a human body?"
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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