सन्न्यासीर धर्म ला गि’ श्रवण मात्र करि ।
तुमि येइ अर्थ कर, बुझिते ना पारि ॥127॥
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अनुवाद
"मैं केवल संन्यास के कर्तव्य पालन के लिए ही सुनता हूँ। दुर्भाग्य से, मैं आपके द्वारा प्रस्तुत अर्थ को ज़रा भी नहीं समझ पा रहा हूँ।"
"I listen only to follow the monastic duty. Unfortunately, I don't understand even a shred of what you're saying."
तात्पर्य
श्री चैतन्य महाप्रभु ने स्वयं को एक ऐसे संन्यासी की तरह प्रस्तुत किया जैसे कि वे नाममात्र के संन्यासी हों या दूसरे शब्दों में कहें तो सर्वश्रेष्ठ मूर्ख हों। भारत में मायावादी संन्यासी स्वयं से जगद्गुरु, विश्व के शिक्षक कहने के आदी होते हैं, जबकि उन्हें विश्व के बारे में जानकारी नहीं होती और उनका अनुभव किसी छोटे शहर या गाँव अथवा भारत तक ही सीमित होता है। ऐसे संन्यासियों के पास पर्याप्त शिक्षा भी नहीं होती है। दुर्भाग्यवश, इस समय भारत और अन्य जगहों पर अनेक मूर्ख संन्यासी हैं, जो वेदों को पढ़ते हैं और उसका अध्ययन करते हैं परन्तु उनके भावार्थ नहीं समझते हैं। जब चैतन्य महाप्रभु नवद्वीप के मुस्लिम मजिस्ट्रेट चाँद काजी के साथ चर्चा कर रहे थे, तो उन्होंने एक वेदवचन का पाठ किया जिसके अनुसार कलियुग में संन्यास धारण करना निषिद्ध है। संन्यास केवल वही धारण करें जो अत्यंत गंभीर हों और विनियमित सिद्धांतों का पालन करें तथा वेदों का अध्ययन करें। श्री चैतन्य महाप्रभु ने संन्यासी के लिए वेदान्त सूत्र या ब्रह्म सूत्र पढ़ना तो स्वीकार किया परन्तु उन्होंने शंकराचार्य के शारीरक भाष्य को स्वीकार नहीं किया। बल्कि उन्होंने कहीं और कहा, मायावादि-भाष्य सुनिले हय सर्वनाशः : "यदि कोई शंकराचार्य का शारीरक भाष्य पढ़ेगा, तो वह नष्ट हो जाएगा।" इस प्रकार एक संन्यासी, एक अतीन्द्रियवादी, को नियमित रूप से वेदान्त सूत्र पढ़ना चाहिए, परन्तु उन्हें शारीरक भाष्य नहीं पढ़ना चाहिए। यह श्री चैतन्य महाप्रभु का निष्कर्ष है। वेदान्त सूत्र पर वास्तविक भाष्य श्रीमद्भागवत है। अर्थोऽयं ब्रह्म-सूत्राणम् : श्रीमद्भाग्वत वेदान्त सूत्र पर स्वयं लेखक श्रील व्यासदेव द्वारा लिखा एक मौलिक भाष्य है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥