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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 6: सार्वभौम भट्टाचार्य की मुक्ति  »  श्लोक 120
 
 
श्लोक  2.6.120 
वेदान्त पड़ाइते तबे आरम्भ करिला ।
स्नेह - भक्ति क रि’ किछु प्रभुरे कहिला ॥120॥
 
 
अनुवाद
फिर उन्होंने भगवान चैतन्य महाप्रभु को वेदान्त दर्शन की शिक्षा देनी आरम्भ की और स्नेह तथा भक्ति से प्रेरित होकर उन्होंने भगवान से इस प्रकार कहा।
 
Then he started teaching Vedanta philosophy to Chaitanya Mahaprabhu and out of love and devotion he spoke to Mahaprabhu as follows.
तात्पर्य
वेदांत- या ब्रह्म-सूत्र, जो श्रील व्यासदेव द्वारा लिखा गया था, ऐसा ग्रंथ है जिसका अध्ययन सभी उन्नत आध्यात्मिक छात्र करते हैं, विशेष रूप से सभी धार्मिक समुदायों (सम्प्रदायों) के संन्यासी। वैदिक ज्ञान के संबंध में अपने अंतिम निष्कर्षों को स्थापित करने के लिए संन्यासियों को वेदांत-सूत्र का अध्ययन करना चाहिए। यहाँ, निःसंदेह, उल्लिखित वेदांत, शंकराचार्य की टिप्पणी है, जिसे शारीरक-भाष्य के रूप में जाना जाता है। सर्वभौम भट्टाचार्य का इरादा वैष्णव संन्यासी चैतन्य महाप्रभु को मायावादी संन्यासी में परिवर्तित करना था। इसलिए उन्होंने शंकराचार्य की शारीरक टीका के अनुसार वेदांत-सूत्र में उन्हें निर्देश देने के लिए यह व्यवस्था की। शंकर-सम्प्रदाय के सभी संन्यासी शारीरक-भाष्य टीका के साथ वेदांत-सूत्र का गंभीरता से अध्ययन करने का आनंद लेते हैं। ऐसा कहा गया है, वेदांत-वाक्येषु सदा रमंतः: "व्यक्ति को हमेशा वेदांत-सूत्र के अध्ययन का आनंद लेना चाहिए।"
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)