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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 6: सार्वभौम भट्टाचार्य की मुक्ति  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  2.6.12 
‘सूद्दीप्त सात्त्विक’ एइ नाम ये ‘प्रलय’ ।
नित्य - सिद्ध भक्ते से ‘सूद्दीप्त भाव’ हय ॥12॥
 
 
अनुवाद
शुद्धिप्त-सात्विक के लक्षण को देखकर, सार्वभौम भट्टाचार्य भगवान चैतन्य महाप्रभु के शरीर में हुए दिव्य आनंदमय परिवर्तन को तुरंत समझ गए। ऐसा लक्षण केवल नित्य मुक्त भक्तों के शरीर में ही होता है।
 
Seeing the symptoms of pure sattvic energy, Sarvabhauma Bhattacharya quickly realized that Chaitanya Mahaprabhu's body had become filled with divine emotion (suddipta bhaav). Such symptoms are only seen in the bodies of eternally accomplished devotees.
तात्पर्य
श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर द्वारा शब्द सूद्दीप्त-सात्विक इस प्रकार समझाया गया है: “भक्तिरसामृत-सिंधु उन्नत भक्तों के शरीर में आठ प्रकार के दैवीय परिवर्तनों का उल्लेख करता है। कभी-कभी ये परिवर्तन भक्त द्वारा नियंत्रित किए जाते हैं और नियंत्रण के इस प्रकार के दो चरण होते हैं, जिन्हें तकनीकी रूप से धूमायिता और ज्वलिता के रूप में जाना जाता है। धूमायिता (धुएँ वाला) चरण तब प्रदर्शित होता है जब केवल एक या दो परिवर्तन थोड़े मात्रा में मौजूद होते हैं और उन्हें छिपाना संभव होता है। जब दो या तीन से अधिक दैवीय परिवर्तन प्रकट होते हैं और उन्हें छिपाना अभी भी संभव है, हालाँकि बड़ी मुश्किल से, उस चरण को ज्वलिता (प्रज्ज्वलित) कहा जाता है। जब चार या पाँच लक्षण प्रदर्शित होते हैं, तो दीप्त (ज्वलंत) चरण तक पहुँच गया है। जब पाँच, छह या सभी आठ लक्षण एक साथ प्रकट होते हैं, तो उस स्थिति को उद्दीप्त (प्रज्वलित) कहा जाता है। और जब सभी आठ लक्षण एक हजार गुना अधिक हो जाते हैं और एक साथ सभी दिखाई देते हैं, तो भक्त सूद्दीप्त (अत्यधिक प्रज्वलित) चरण में होता है। नित्य-सिद्ध-भक्त भगवान के सनातन मुक्त सहयोगियों को इंगित करता है। ऐसे भक्त भगवान की संगति का चारों रिश्तों- सेवक, मित्र, माता-पिता या वैवाहिक प्रेमी के रूप में आनंद लेते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)