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श्री चैतन्य चरितामृत
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श्लोक 117
श्लोक
2.6.117
आमार सन्न्यास - धर्म चाहेन राखिते ।
वात्सल्ये करुणा करेन, कि दोष इहाते ॥117॥
अनुवाद
"मेरे प्रति पितृवत स्नेह के कारण वे मेरी रक्षा करना चाहते हैं और यह देखना चाहते हैं कि मैं संन्यासी के नियमों का पालन करूँ। इसमें क्या दोष है?"
"He wants to protect me out of affection for me and wants me to follow the rules of a monk. What's wrong with that?"
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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