श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 6: सार्वभौम भट्टाचार्य की मुक्ति  »  श्लोक 115
 
 
श्लोक  2.6.115 
मुकुन्द - सहित कहे भट्टाचार्येर कथा ।
भट्टाचार्येर निन्दा करे, मने पाञा व्यथा ॥115॥
 
 
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु के समक्ष भट्टाचार्य के कथनों पर चर्चा हुई। गोपीनाथ आचार्य और मुकुंद दत्त ने भट्टाचार्य के कथनों को अस्वीकार कर दिया क्योंकि उनसे मानसिक पीड़ा होती थी।
 
Bhattacharya's statements were discussed before Sri Chaitanya Mahaprabhu. Gopinath Acharya and Mukunda Dutta both rejected Bhattacharya's statements, saying they caused them mental distress.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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