श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 6: सार्वभौम भट्टाचार्य की मुक्ति  »  श्लोक 110
 
 
श्लोक  2.6.110 
तबे भट्टाचार्य कहे, याह गोसाञि र स्थाने ।
आमार नामे गण - सहित कर निमन्त्रणे ॥110॥
 
 
अनुवाद
गोपीनाथ आचार्य से यह सुनकर सार्वभौम भट्टाचार्य ने कहा, "पहले उस स्थान पर जाओ जहाँ श्री चैतन्य महाप्रभु विराजमान हैं और उन्हें उनके पार्षदों सहित यहाँ आमंत्रित करो। मेरे लिए उनसे प्रार्थना करो।"
 
Hearing this from Gopinath Acharya, Sarvabhauma Bhattacharya said, “First you go to the place where Sri Chaitanya Mahaprabhu is staying and invite him along with his companions on my behalf and call him here.”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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