युक्तं च सन्ति सर्वत्र भाषन्ते ब्राह्मणा ग्रथा ।
मायां मदीयामुद्गृह्य वदतां किं नु दुर्घटम् ॥109॥
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अनुवाद
“‘लगभग सभी मामलों में, विद्वान ब्राह्मण जो कुछ भी बोलते हैं वह स्वीकार्य हो जाता है; जो मेरी मायावी शक्ति का आश्रय लेता है और उसके प्रभाव में बोलता है, उसके लिए कुछ भी असंभव नहीं है।’”
"In almost all areas, the words of a learned Brahmin are valid. For one who surrenders to my external illusion and speaks under its influence, nothing is impossible."
तात्पर्य
श्रीमद् भागवतम् (11.22.4) के इस श्लोक में, भगवान बताते हैं कि उनकी माया असंभव को संभव कर सकती है; इतनी शक्तिशाली उनकी माया है। अक्सर दार्शनिक सत्य को ढंक देते हैं और झूठे सिद्धांत बनाते हैं। प्राचीन समय में कपिल, गौतम, जैमिनी, कनाड जैसे ब्राह्मणों ने कई बेकार सिद्धांत बनाए और आधुनिक युग में तथाकथित वैज्ञानिक भी सृष्टि के बारे में तर्कों के नाम पर झूठे सिद्धांत बना रहे हैं। यह सब भगवान की माया का प्रभाव है। भगवान की माया सही प्रतीत होती है क्योंकि उसका जन्म असली सत्य से होता है। भ्रामक माया के प्रभाव से बचने के लिए, भगवान के शब्दों को जैसे वे हैं वैसे ही स्वीकार करना होगा। केवल इसी से माया के प्रभाव से बचा जा सकता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥