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श्लोक 2.5.59  |
‘तीर्थ - यात्राय पितार सङ्गे छिल बहु धन ।
धन देखि एइ दुष्टेर लैते हैल मन’ ॥59॥ |
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| अनुवाद |
| “विभिन्न तीर्थस्थलों की यात्रा करते समय मेरे पिता बहुत सारा धन साथ लेकर चलते थे। धन देखकर इस दुष्ट ने उसे छीनने का निश्चय किया। |
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| "My father took a lot of money with him while on pilgrimage. This rascal was determined to steal it." |
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