श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 5: साक्षीगोपाल की लीलाएँ  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  2.5.44 
नाहि कहि - ना कहिओ ए मिथ्या - वचन ।
सबे कहिबे - ‘मोर किछु नाहिक स्मरण’ ॥44॥
 
 
अनुवाद
"आपको साफ़-साफ़ इनकार करने की ज़रूरत नहीं है कि आपने ऐसा कुछ कहा था। कोई झूठ बोलने की ज़रूरत नहीं है। बस इतना कह दीजिए कि आपको याद नहीं कि आपने क्या कहा था।"
 
"You don't have to say straight away that you didn't say that. There's no need to lie. Just say that you don't remember what you said."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)