श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 5: साक्षीगोपाल की लीलाएँ  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  2.5.28 
भीष्मकेर इच्छा , - कृष्णे कन्या समर्पिते ।
पुत्रेर विरोधे कन्या नारिल अर्पिते ॥28॥
 
 
अनुवाद
राजा भीष्मक अपनी पुत्री रुक्मिणी को कृष्ण को दान में देना चाहते थे, लेकिन उनके ज्येष्ठ पुत्र रुक्मी ने इसका विरोध किया। इसलिए वे अपना निर्णय पूरा नहीं कर सके।
 
"King Bhishmaka wanted to give his daughter Rukmini to Krishna, but his eldest son Rukmi objected. Therefore, he could not carry out his decision."
तात्पर्य
जैसा कि श्रीमद् भागवतम् (10.52.25) में कहा गया है:

बंधूनाम इच्छताम् दातुम् कृष्णाय भगिनीम् नृप

ततो निवार्य कृष्ण-द्विड रूक्मी कैद्यम अमन्यत

विदर्भ के राजा भीष्मक कृष्ण को अपनी पुत्री रुक्मिणी देना चाहते थे, परन्तु उनके पाँच पुत्रों में सबसे बड़े रुक्मी ने इसका विरोध किया। इसलिए भीष्मक ने अपना निर्णय वापस ले लिया और रुक्मिणी का विवाह चेदि के राजा शिशुपाल से करने का निर्णय किया, जो कि कृष्ण का चचेरा भाई था। परन्तु रुक्मिणी ने एक चाल चली: उसने कृष्ण को एक पत्र लिखा जिसमे उसे अपहरण करके ले जाने को कहा| इस प्रकार रुक्मिणी, जो कि उनकी एक महान भक्त थी, को प्रसन्न करने के लिए कृष्ण ने उसका अपहरण किया| इसके पश्चात कृष्ण और रुक्मिणी के भाई रुक्मी के नेतृत्व में विरोधी दल के बीच एक महान युद्ध हुआ| रुक्मी हार गया और कृष्ण के खिलाफ कड़वे शब्द बोलने के कारण उसे मार दिया जाने वाला था, परन्तु रुक्मिणी के निवेदन पर उसे बख्श दिया गया| हालाँकि कृष्ण ने अपनी तलवार से रुक्मी के सारे बाल मुँड़वा दिए| श्री बलराम को यह पसंद नहीं पड़ा, और इसलिए रुक्मिणी को प्रसन्न करने के लिए बलराम ने कृष्ण को फटकार लगाई|

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)