श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 5: साक्षीगोपाल की लीलाएँ  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  2.5.24 
“ब्राह्मण - सेवाय कृष्णेर प्रीति बड़ हय ।
ताँहार सन्तोषे भक्ति - सम्पद्वाड़ य” ॥24॥
 
 
अनुवाद
भगवान कृष्ण ब्राह्मणों की सेवा से बहुत प्रसन्न होते हैं और जब भगवान प्रसन्न होते हैं तो भक्ति सेवा का ऐश्वर्य बढ़ जाता है।
 
“Lord Krishna is very pleased by serving Brahmins and when the Lord is pleased, the wealth of devotion increases.”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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