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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 5: साक्षीगोपाल की लीलाएँ  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  2.5.23 
कन्या - दान - पात्र आमि ना ह ई तोमार ।
कृष्ण - प्रीत्ये करि तोमार सेवा - व्यवहार ॥23॥
 
 
अनुवाद
"महाराज, मैं आपकी पुत्री के लिए उपयुक्त वर नहीं हूँ। मैं केवल कृष्ण की संतुष्टि के लिए आपकी सेवा करता हूँ।"
 
"O Sir, I am not a suitable match for your daughter. I am serving you only to please Krishna."
तात्पर्य
दोनों ब्राह्मण शुद्ध वैष्णव थे। छोटा ब्राह्मण कृष्ण को प्रसन्न करने के लिए बड़े ब्राह्मण की विशेष देखभाल करता था। श्रीमद-भागवतम (11.19.21) में कृष्ण कहते हैं, मद्-भक्त-पूजाभ्यधिक: " मेरे भक्त की सेवा करना बेहतर है।" इस प्रकार, चैतन्य महाप्रभु के गौडीय-वैष्णव दर्शन के अनुसार, ईश्वर के सेवक का सेवक बनना बेहतर है। किसी को सीधे कृष्ण की सेवा करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। एक शुद्ध वैष्णव कृष्ण के एक सेवक की सेवा करता है और खुद को कृष्ण के सेवक के सेवक के रूप में पहचानता है। यह भगवान कृष्ण को प्रिय है। श्रील नरसिम्हा ठाकुर इस दर्शन की पुष्टि करते हैं: चाडिया वैष्णव-सेवा निस्तार पेचे केबा। जब तक कोई मुक्त वैष्णव की सेवा नहीं करता, वह सीधे कृष्ण की सेवा करके मुक्ति प्राप्त नहीं कर सकता। उसे कृष्ण के सेवक की सेवा करनी चाहिए।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)