Warning: Undefined array key 1 in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 93

Deprecated: nl2br(): Passing null to parameter #1 ($string) of type string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 97
श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 5: साक्षीगोपाल की लीलाएँ  »  श्लोक 158
 
 
श्लोक  2.5.158 
दण्ड - भङ्ग - लीला एइ - परम गम्भीर ।
सेइ बुझे, दुँहार पदे याँर भक्ति धीर ॥158॥
 
 
अनुवाद
दण्ड तोड़ने की लीला बड़ी गहन है। केवल वही व्यक्ति इसे समझ सकता है जिसकी भक्ति दोनों भगवानों के चरणकमलों में स्थिर है।
 
The Dandabhaṅga Leela is extremely profound. Only one who has firm devotion to the lotus feet of both Lords can understand it.
तात्पर्य
जो लोग वास्तव में श्री चैतन्य महाप्रभु और नित्यानंद प्रभु को समझते हैं वे उनकी पहचान और साथ ही दंड के टूटने को भी समझ सकते हैं। सभी पिछले आचार्यों ने स्वयं को पूर्ण रूप से भगवान की सेवा में समर्पित करने के बाद भौतिक जीवन से लगाव त्याग कर दंड स्वीकार किया, जो कि भगवान की सेवा में मन, वाणी और शरीर को पूर्ण रूप से अर्पित करने का प्रतीक है। श्री चैतन्य महाप्रभु ने जीवन के परित्यक्त व्यवस्था के नियमों को स्वीकार किया। यह पूरी तरह से स्पष्ट है। हालांकि, परमहंस स्तर पर दंड (छड़ी) को स्वीकार करने की आवश्यकता नहीं होती है, और श्री चैतन्य महाप्रभु निश्चित रूप से परमहंस स्तर पर थे। फिर भी, यह इंगित करने के लिए कि सभी को भगवान की सेवा में पूर्ण रूप से संलग्न होने के लिए जीवन के अंत में संन्यास लेना चाहिए, श्री चैतन्य महाप्रभु और उनके विश्वासपात्र भक्त जैसे परमहंस भी अनुशासनात्मक सिद्धांतों का अविचलित रूप से पालन करते हैं। दरअसल, यही उनका उद्देश्य था। नित्यानंद प्रभु, जो उनके अनन्त सेवक थे, का मानना था कि श्री चैतन्य महाप्रभु को दंड ले जाने की कोई आवश्यकता नहीं है और यह घोषित करने के लिए कि श्री चैतन्य महाप्रभु सभी नियमों से ऊपर हैं, उन्होंने इसे तीन टुकड़ों में तोड़ दिया। श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर ने लीला को दंड-भंग-लीला के रूप में जाना जाता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)