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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 5: साक्षीगोपाल की लीलाएँ  »  श्लोक 152
 
 
श्लोक  2.5.152 
शुनि’ किछु महाप्रभु दुःख प्रकाशिला ।
ईषत् क्रोध करि’ किछु कहिते लागिला ॥152॥
 
 
अनुवाद
अपनी लाठी के टूटने की कहानी सुनने के बाद, प्रभु ने थोड़ा दुःख व्यक्त किया और थोड़ा क्रोध प्रदर्शित करते हुए, इस प्रकार बोलना शुरू किया।
 
Hearing the story of the way his stick was broken, Mahaprabhu expressed some sadness and became a little angry and spoke as follows.
तात्पर्य
श्री नित्यानंद प्रभु ने भगवान चैतन्य महाप्रभु द्वारा संन्यास स्वीकार करने को व्यर्थ माना। इसलिए उन्होंने प्रभु को दंड ले जाने की तकलीफ से छुटकारा दिलाया। श्री चैतन्य महाप्रभु ने क्रोध व्यक्त किया क्योंकि वह अन्य सभी संन्यासियों को यह सिखाना चाहते थे कि उन्हें परमहंस की स्थिति प्राप्त करने से पहले दंड नहीं छोड़ना चाहिए। यह देखते हुए कि इस तरह की कार्रवाई से नियमन सिद्धांतों को ढीला किया जा सकता है, चैतन्य महाप्रभु व्यक्तिगत रूप से दंड ले जाना चाहते थे। हालाँकि, नित्यानंद ने इसे तोड़ दिया। इस कारण से चैतन्य महाप्रभु ने थोड़ा गुस्सा दिखाया। जैसा कि भगवद-गीता (3.21) में कहा गया है, यद् यद आचरति श्रेष्ठस्तत् तद एवेतरो जनः: महान लोग जो भी करते हैं, अन्य लोग उसका अनुसरण करते हैं। श्री चैतन्य महाप्रभु परमहंसों की नकल करने की कोशिश करने वाले अनुभवहीन नवजात शिशुओं को बचाने के लिए वैदिक सिद्धांतों का दृढ़ता से पालन करना चाहते थे।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)