श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 5: साक्षीगोपाल की लीलाएँ  »  श्लोक 150
 
 
श्लोक  2.5.150 
दुइ - जनार भरे दण्ड खण्ड खण्ड हैल ।
सेइ खण्ड काँहा पड़िल, किछु ना जानिल ॥150॥
 
 
अनुवाद
"इस प्रकार लाठी हमारे भार से टूट गई। उसके टुकड़े कहाँ गए, मैं नहीं कह सकता।"
 
"That's how the stick broke under our weight. I don't know where the pieces went."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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