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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 5: साक्षीगोपाल की लीलाएँ  »  श्लोक 144
 
 
श्लोक  2.5.144 
जगन्नाथेर देउल देखि’ आविष्ट हैला ।
दण्डवत्करि प्रेमे नाचिते लागिला ॥144॥
 
 
अनुवाद
दूर से जगन्नाथ मंदिर देखकर श्री चैतन्य महाप्रभु तुरंत आनंदित हो गए। मंदिर को प्रणाम करने के बाद, वे भगवद्प्रेम के आनंद में नाचने लगे।
 
Sri Chaitanya Mahaprabhu was immediately moved by the sight of the Jagannath temple from a distance. After prostrating before the temple, he began dancing in ecstasy.
तात्पर्य
"देउल" शब्द उस मंदिर को संदर्भित करता है जहाँ भगवान का सर्वोच्च व्यक्तित्व स्थित है। जगन्नाथ पुरी का वर्तमान मंदिर राजा अनंग-भीम द्वारा बनाया गया था। इतिहासकारों का कहना है कि यह मंदिर कम से कम दो हजार साल पहले बनाया गया होगा। श्री चैतन्य महाप्रभु के समय में, मूल मंदिर के आसपास की छोटी इमारतों का निर्माण नहीं हुआ था। न ही मंदिर के सामने ऊँचा चबूतरा श्री चैतन्य महाप्रभु के समय में मौजूद था।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)