श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 5: साक्षीगोपाल की लीलाएँ  »  श्लोक 127
 
 
श्लोक  2.5.127 
ठाकुरेर नासाते यदि छिद्र थाकित ।
तबे एइ दासी मुक्ता नासाय पराइत ॥127॥
 
 
अनुवाद
“यदि देवता की नाक में छेद हो तो मैं मोती उन्हें हस्तांतरित कर सकता हूँ।”
 
“If the idol had a hole in its nose, I could wear my pearl on it.”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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