श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 5: साक्षीगोपाल की लीलाएँ  »  श्लोक 107
 
 
श्लोक  2.5.107 
ब्राह्मणेरे कहे , - “तुमि याह निज - घर ।
एथाय रहिब आमि, ना याब अत:पर” ॥107॥
 
 
अनुवाद
भगवान ने ब्राह्मण से कहा, "अब तुम घर जा सकते हो। मैं यहीं रहूँगा और यहाँ से नहीं जाऊँगा।"
 
The Lord said to the Brahmin, "You may go home now. I will stay here and will not go anywhere else."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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