| श्री चैतन्य चरितामृत » लीला 2: मध्य लीला » अध्याय 4: श्री माधवेन्द्र पुरी की भक्ति » श्लोक 45 |
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| | | | श्लोक 2.4.45  | श्रीकृष्णके देखिनु मुञि नारिनु चिनिते ।
एत ब लि’ प्रेमावेशे पड़िला भूमिते ॥45॥ | | | | | | | अनुवाद | | माधवेन्द्र पुरी विलाप करने लगे, “मैंने भगवान कृष्ण को प्रत्यक्ष देखा, परन्तु मैं उन्हें पहचान नहीं सका!” इस प्रकार वे प्रेमोन्मत्त होकर भूमि पर गिर पड़े। | | | | Madhavendra Puri started repenting, “I saw Lord Krishna personally, but I could not recognize him!” Saying this he fell on the ground in love. | | ✨ ai-generated | | |
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