श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 4: श्री माधवेन्द्र पुरी की भक्ति  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  2.4.22 
प्रेमे मत्त, - नाहि ताँर रात्रि - दिन - ज्ञान ।
क्षणे उठे, क्षणे पड़े, नाहि स्थानास्थान ॥22॥
 
 
अनुवाद
माधवेन्द्र पुरी भगवान के प्रेम में मदमस्त होकर लगभग पागल हो गए थे, उन्हें पता ही नहीं चल रहा था कि दिन है या रात। कभी वे खड़े हो जाते, तो कभी ज़मीन पर गिर पड़ते। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि वे सही जगह पर हैं या नहीं।
 
Madhavendra Puri was crazy in love of God and he did not even know whether it was day or night.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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