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श्लोक 2.4.211  |
एइ त’ आख्याने कहिला दोंहार महिमा ।
प्रभुर भक्त - वात्सल्य, आर भक्त - प्रेम - सीमा ॥211॥ |
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| अनुवाद |
| इस प्रकार मैंने भगवान चैतन्य महाप्रभु के अपने भक्तों के प्रति स्नेह की दिव्य महिमा तथा भगवान के प्रति परमानंद प्रेम की सर्वोच्च सीमा, दोनों का वर्णन किया है। |
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| In this way I have described both the divine glory of Sri Chaitanya Mahaprabhu's affection towards his devotees and the pinnacle of his feeling of love for God. |
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