श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 4: श्री माधवेन्द्र पुरी की भक्ति  »  श्लोक 197
 
 
श्लोक  2.4.197 
अयि दीन - दयार्द्र नाथ हे मथुरा - नाथ कदावलोक्यसे ।
हृदयं त्वदलोक - कातरं दयित भ्राम्यति किं करोम्यहम् ॥197॥
 
 
अनुवाद
"हे मेरे प्रभु! हे परम दयालु स्वामी! हे मथुरा के स्वामी! मैं आपके पुनः दर्शन कब करूँगा? आपके दर्शन न होने के कारण मेरा व्याकुल हृदय चंचल हो गया है। हे परम प्रियतम, अब मैं क्या करूँ?"
 
"O Lord! O most gracious Lord! O Lord of Mathura! When will I see you again? My troubled heart has become unstable because I cannot see you. O beloved, what should I do now?"
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd