श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 4: श्री माधवेन्द्र पुरी की भक्ति  »  श्लोक 195
 
 
श्लोक  2.4.195 
किबा गौरचन्द्र इहा करे आस्वादन ।
इहा आस्वादिते आर नाहि चौठ - जन ॥195॥
 
 
अनुवाद
केवल श्री चैतन्य महाप्रभु ने ही इस श्लोक का काव्य रसास्वादन किया है। कोई चौथा व्यक्ति इसे समझने में समर्थ नहीं है।
 
Only Sri Chaitanya Mahaprabhu has tasted the poetic essence of this verse. No fourth person is capable of understanding it.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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