श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 4: श्री माधवेन्द्र पुरी की भक्ति  »  श्लोक 181
 
 
श्लोक  2.4.181 
भोके रहे, तबु अन्न मागिञा ना खाय ।
हेन - जन चन्दन - भार व हि’ लञा याय ॥181॥
 
 
अनुवाद
"माधवेन्द्र पुरी यद्यपि भूखे थे, फिर भी उन्होंने भोजन के लिए भिक्षा नहीं माँगी। इस त्यागी ने श्री गोपाल के लिए चंदन का बोझ ढोया।"
 
"Madhavendra Puri, even when hungry, never asked anyone for food. This detached man carried the burden of sandalwood for Shri Gopal."
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd