श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 4: श्री माधवेन्द्र पुरी की भक्ति  »  श्लोक 157
 
 
श्लोक  2.4.157 
सेइ रात्रे देवालये करिल शयन ।
शेष - रात्रि हैले पुरी देखिल स्वपन ॥157॥
 
 
अनुवाद
माधवेन्द्र पुरी ने उस रात मंदिर में विश्राम किया, लेकिन रात के अंत में उन्हें एक और सपना आया।
 
That night Madhavendra Puri rested in the temple, but at the end of the night he had another dream.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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