श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 4: श्री माधवेन्द्र पुरी की भक्ति  »  श्लोक 130
 
 
श्लोक  2.4.130 
स्वप्न देखि’ पूजारी उठि’ करिला विचार ।
स्नान क रि’ कपाट खुलि, मुक्त कैल द्वार ॥130॥
 
 
अनुवाद
सपने से जागकर पुजारी तुरंत बिस्तर से उठे और सोचा कि भगवान के कमरे में जाने से पहले स्नान कर लेना उचित होगा। फिर उन्होंने मंदिर का द्वार खोला।
 
Upon realizing his dream, the priest immediately got up from his bed and decided to bathe before entering the Deity's chamber. He then opened the temple door.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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