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श्री चैतन्य चरितामृत
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लीला 2: मध्य लीला
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अध्याय 4: श्री माधवेन्द्र पुरी की भक्ति
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श्लोक 129
श्लोक
2.4.129
माधव - पुरी सन्न्यासी आछे हाटेते वसिञा ।
ताहाके त’ एइ क्षीर शीघ्र देह लञा ॥129॥
अनुवाद
"माधवेन्द्र पुरी नाम के एक संन्यासी खाली बाज़ार में बैठे हैं। कृपया मेरे पीछे से मीठे चावलों का यह बर्तन लेकर उन्हें दे दीजिए।"
"A monk named Madhavendra Puri is sitting in a deserted market place. Please take this pot of kheer from behind me and give it to him."
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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