श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 4: श्री माधवेन्द्र पुरी की भक्ति  »  श्लोक 100
 
 
श्लोक  2.4.100 
स्वर्ण, रौप्य, वस्त्र, गन्ध, भक्ष्य - उपहार ।
असङ्ख्य आइसे, नित्य बाड़िल भाण्डार ॥100॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार सोना, चाँदी, वस्त्र, सुगन्धित वस्तुएँ और खाने-पीने की अनगिनत वस्तुएँ आती रहीं। गोपाल का भण्डार प्रतिदिन बढ़ता गया।
 
In this way, countless gifts of gold, silver, clothes, perfumes and food items came and Gopal's store kept increasing every day.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)