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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 3: श्री चैतन्य महाप्रभु का अद्वैत आचार्य के घर रुकना  »  श्लोक 97
 
 
श्लोक  2.3.97 
तोरे निमन्त्रण क रि’ पाइनु तार फल ।
तोर जाति - कुल नाहि, सहजे पागल ॥97॥
 
 
अनुवाद
अद्वैत आचार्य ने मज़ाक करते हुए कहा, "मेरे प्रिय नित्यानंद, मैंने आपको आमंत्रित किया था और मुझे उसका फल भी मिला है। आपकी कोई निश्चित जाति या वंश नहीं है। आप स्वभाव से ही पागल हैं।"
 
Advaita Acharya said jokingly, "Dear Nityananda, I invited you, and I have already received the reward. You have no fixed caste or lineage. You are crazy by nature."
तात्पर्य
"सहजे पागला" ("स्वभाव से पागल") शब्द दर्शाते हैं कि नित्यानंद प्रभु आध्यात्मिक रूप से परमहंस की स्थिति में थे। क्योंकि वह हमेशा राधा-कृष्ण और उनकी सेवा को याद करते थे, इसलिए यह आध्यात्मिक पागलपन था। श्री अद्वैत आचार्य इस तथ्य की ओर इशारा कर रहे थे।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)