श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 3: श्री चैतन्य महाप्रभु का अद्वैत आचार्य के घर रुकना  »  श्लोक 87
 
 
श्लोक  2.3.87 
ये पाञाछ मुष्ट्येक अन्न, ताहा खाञा उठ ।
पागलामि ना करिह, ना छड़ाइओ झुठ ॥87॥
 
 
अनुवाद
"जो कुछ भी तुम्हारे पास है, चाहे वह मुट्ठी भर चावल ही क्यों न हो, कृपया उसे खा लो और उठ जाओ। अपना पागलपन मत दिखाओ और खाने के बचे हुए हिस्से को इधर-उधर मत बिखेरो।"
 
"Please eat whatever I've given you, even if it's just a handful of rice, and get up. Don't show your madness and scatter leftovers."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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