श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 3: श्री चैतन्य महाप्रभु का अद्वैत आचार्य के घर रुकना  »  श्लोक 86
 
 
श्लोक  2.3.86 
तुमि खेते पार दश - विश मानेर अन्न ।
आमि ताहा काँहा पाब दरिद्र ब्राह्मण ॥86॥
 
 
अनुवाद
अद्वैत आचार्य ने नित्यानंद प्रभु पर आरोप लगाते हुए कहा, "आप दस से बीस मन चावल खा सकते हैं। मैं एक गरीब ब्राह्मण हूँ। मुझे इतना चावल कहाँ से मिलेगा?"
 
Casting a slander on Nityananda Prabhu, Advaita Acharya said, "You can eat ten to twenty maunds of rice. I am a poor Brahmin. How can I bring so much rice?"
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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