श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 3: श्री चैतन्य महाप्रभु का अद्वैत आचार्य के घर रुकना  »  श्लोक 74
 
 
श्लोक  2.3.74 
प्रभु बले - एत अन्न नारिब खाइते ।
सन्न्यासीर धर्म नहे उच्छिष्ट राखिते ॥74॥
 
 
अनुवाद
श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, "मैं इतना भोजन नहीं खा पाऊँगा, और बचा हुआ भोजन छोड़ना संन्यासी का कर्तव्य नहीं है।"
 
Sri Chaitanya Mahaprabhu said, “I will not be able to eat so much food and it is not the duty of a Sanyasi to leave leftovers.”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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