श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 3: श्री चैतन्य महाप्रभु का अद्वैत आचार्य के घर रुकना  »  श्लोक 194
 
 
श्लोक  2.3.194 
नीलाचले याबे तुमि, मोर कोन्गति ।
नीलाचले याइते मोर नाहिक शकति ॥194॥
 
 
अनुवाद
हरिदास ठाकुर ने कहा, "आप जगन्नाथ पुरी जा रहे हैं, और यह तो ठीक है, लेकिन मेरा गंतव्य क्या होगा? मैं जगन्नाथ पुरी नहीं जा सकता।"
 
Haridasa Thakura said, "It is all right that you are going to Nilachala (Jagannath Puri), but what will happen to me? I am unable to go to Nilachala."
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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