श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 3: श्री चैतन्य महाप्रभु का अद्वैत आचार्य के घर रुकना  »  श्लोक 165
 
 
श्लोक  2.3.165 
बाल्यकाल हैते तोमार ये कैलुँ सेवन ।
तार एइ फल मोरे देह नारायण ॥165॥
 
 
अनुवाद
“मेरे प्रिय प्रभु, बचपन से मैंने आपकी जो भी सेवा की है, उसके फलस्वरूप कृपया मुझे यह वरदान प्रदान करें।
 
“O Lord, please grant me this boon in return for all the service I have rendered to you from my childhood till today.”
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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