श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 3: श्री चैतन्य महाप्रभु का अद्वैत आचार्य के घर रुकना  »  श्लोक 146
 
 
श्लोक  2.3.146 
तोमार पालित देह, जन्म तोमा हैते ।
कोटि जन्मे तोमार ऋण ना पारि शोधिते ॥146॥
 
 
अनुवाद
"यह शरीर आपसे ही उत्पन्न हुआ है, और आपसे ही प्राप्त हुआ है। मैं करोड़ों जन्मों में भी इस ऋण से उऋण नहीं हो सकता।"
 
This body has been nurtured by you and is born of you. I cannot repay this debt even in millions of lifetimes.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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