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श्री चैतन्य चरितामृत  »  लीला 2: मध्य लीला  »  अध्याय 3: श्री चैतन्य महाप्रभु का अद्वैत आचार्य के घर रुकना  »  श्लोक 125
 
 
श्लोक  2.3.125 
रात्रि - दिने पोड़े मन सोयास्ति ना पाँ ।
याहाँ गेले कानु पाँ, ताहाँ उ ड़ि’ याँ ॥125॥
 
 
अनुवाद
"मेरी भावना ऐसी है: मेरा मन दिन-रात जलता रहता है, और मुझे चैन नहीं मिलता। अगर कोई ऐसी जगह होती जहाँ मैं कृष्ण से मिल सकता, तो मैं तुरंत वहाँ भाग जाता।"
 
“My feeling is this: my mind burns day and night and I get no rest at all.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)